प्रयागराज | दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक और सांस्कृतिक माघ मेला में गृहस्थ जीवन का त्याग कर सोमवार से कल्पवास करने के लिए कल्पवासी और मकर संक्रांति पर आस्था की डुबकी लगाने के लिए श्रद्धालुओं का रेला बढ़ता चला आ रहा है।
गंगा की विस्तीर्ण रेती पर लगे तंबुओं की नगरी में कल्पवासी और श्रद्धालु तीर्थ पुरोहितों के शिविर में भजन कीर्तन में व्यस्त हो जाएंगे। कल्पवासी और श्रद्धालु झूंसी क्षेत्र की तरफ से ट्रैक्टर पर पैरा (पुआल), महीने भर के राशन के साथ रजाई, गद्दे लादकर मेला क्षेत्र में अपने अपने तीर्थपुरोहित से संपर्क कर रहे हैं। तीर्थ पुरोहितों के शिविर अभी पूर्ण रूप से तैयार नहीं हैं। कल्पवासी शिविर को तैयार करने में भी सहयोग कर रहे हैं। भक्तिभाव से ओतप्रोत बच्चे, युवा और बुजुर्ग मेला क्षेत्र में पहुंच रहे हैं। अभी संत और तीर्थ पुरोहित अपने-अपने शिविर दुरूस्त करने में व्यस्त हैं। दंडी संन्यासीनगर, आचार्य नगर, खाक चौक में संतों का शिविर लग रहा है। तीर्थराज प्रयाग की धरा में श्रद्धालुओं को उचित प्रशासनिक प्रबंध नहीं होने के बावजूद संत और श्रद्धालु हर्षित दिख रहे हैं। गोरखपुर से चलकर कानपुर अनवरगंज जाने वाली चौरी-चौरा एक्सप्रेस से बड़ी संख्या में कल्पवासी गठरी और बोरी में भरकर प्रयागराज रामबाग पहुंच रहे हैं। इसी प्रकार बिहार और मध्य प्रदेश से भी श्रद्धालु मेले में पहुंच रहे हैं। चुंगी से मेला क्षेत्र तक श्रद्धालु पैदल ही सिर पर गठरी लादे पहुंच रहे हैं। तीर्थ पुरोहित राजेन्द्र पाल ने बताया कि मकर संक्रांति स्रान पर्व दो दिन है। परंपरा के अनुसार श्रद्धालु 14 जनवरी को स्रान कर रहे हैं जबकि मकर संक्रांति का मुहूर्त सोमवार को 15 जनवरी को पड़ेगा जिसमें बड़ी संख्या में कल्पवासी,गृहस्थ और श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाएंगे।
उन्होंने बताया कि साधु-संतोें के साथ-साथ गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग भी कल्पवास को धारण करते हैं। उन्होंने बताया कि माघ मेला क्षेत्र में पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक कल्पवास करने का विधान बताया गया है। कुछ कल्पवासी मकर संक्रांति से माघ शुक्ल की संक्रांति तक कल्पवास करते हैं जबकि 90 फीसदी कल्पवासी पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक कल्पवास करते हैं। मकर संक्रांति से माघ शुक्ल की संक्रांति तक कल्पवास करने वालो में मैथिल के साथ बिहार और बंगाल के श्रद्धालुओं के अलावा हिमाचल प्रदेश और नेपाल से आने वाले श्रद्धालु-कल्पवासी भी शामिल है। मान्यता है कि सभी नियमों का पालन कर कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं को किसी न किसी रूप में देवदर्शन होते हैं।