सहारनपुर | लोकसभा चुनाव में अभी वक्त है लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में विभिन्न राजनीतिक दलों में प्रत्याशियों को लेकर कयासबाजी का दौर शुरु हो गया है।
समाजवादी पार्टी (सपा) के सूत्रों के मुताबिक सूबे के प्रवेश द्वार सहारनपुर एवं कैराना पर पार्टी ने उम्मीदवारों को लेकर मंथन किया है। सपा सूत्रों के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव दोनों में से एक सीट पर मुस्लिम और एक सीट पर ंिहदू उम्मीदवार उतारना चाहते हैं मगर परेशानी यह है कि उनके पास दोनों सीटों पर मुस्लिम दावेदार थोड़ी मजबूत स्थिति में हैं और उनके दावे भी भारी भरकम हैं। ंिहदू उम्मीदवारों में सपा का दांव गुर्जर बिरादरी पर है। कैराना सीट पर चौधरी रूद्रसेन अपनी दावेदारी जता रहे हैं। हाल ही में उन्हें सपा का राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया गया है।
चौधरी रूद्रसेन दिवंगत गुर्जर नेता चौधरी यशपाल ंिसह के बेटे हैं। चौधरी यशपाल ंिसह की स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गुर्जरों में बहुत मजबूत थी। इस परिवार की दिक्कत यह है कि यशपाल ंिसह के जाने के बाद उनका कोई भी बेटा किसी भी चुनाव में सफलता प्राप्त नहीं कर पाया है। गुर्जरों में जो बड़ा बदलाव आया है वह उनका भाजपा की ओर रूझान हो जाना है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार सहारनपुर सीट पर अखिलेश यादव की पहली पसंद मौजूदा सांसद हाजी फजर्लुरहमान कुरैशी हैं। जो पिछले चुनाव में सपा के समर्थन से बसपा के टिकट पर चुने गए थे। उन्हें 514139 वोट मिले थे। सहारनपुर जिले में 38 से 40 फीसद तक मुस्लिम और 20 से 22 फीसद तक दलित मतदाता है। इसलिए अनुकूल हालात में विपक्षी दल दोनों सीटें जीतने का मंसूबा पाले हुए है, लेकिन विजयी उम्मीदवार का चयन करना उनके लिए जीत दर्ज करने से भी ज्यादा मुश्किल है।
चुनावों में यह देखने में आया है कि मुस्लिम उम्मीदवारों को मुसलमान जिस जज्बे और जुनून से वोट करता है, वह धर्मनिरपेक्ष दलों के ंिहदू उम्मीदवारों को उस अनुपात में वोट नहीं डालता है। यह बात इस तथ्य से उजागर हो जाती है कि 2022 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में सहारनपुर की बेहट और सहारनपुर देहात दोनों सीटों पर सपा के मुस्लिम उम्मीदवार क्रमश: उमर अली खान और आशु मलिक आसानी से जीत गए जबकि भारी मुस्लिम वोटों वाली सहारनपुर शहर और देवबंद सीट पर उसके दोनों उम्मीदवार क्रमश: संजय गर्ग और कार्तिकेय राणा कड़े मुकाबले में भाजपा उम्मीदवारों से चुनाव हार गए।
लोकसभा चुनाव 2019 में सहारनपुर लोकसभा सीट पर बसपा के सपा समर्थित उम्मीदवार फजर्लुरहमान मैदान में इमरान मसूद के 207000 वोट लेने के बावजूद भाजपा के राघव लखनपाल शर्मा को आसानी से हराने में सफल हो गए। जबकि 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के रूप में दिक्कज गुर्जर नेता चौधरी यशपाल ंिसह आसानी से चुनाव हार गए थे। ऐसे में अखिलेश यादव यदि इस सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार का चयन करते हैं तो वे राजनीतिक दृष्टि से ज्यादा मुफीद रह सकता है।
कैराना सीट पर भी मुस्लिम उम्मीदवार ंिहदू उम्मीदवार की तुलना में सपा के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। सपा की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि यदि गठबंधन में बसपा शामिल नहीं रहती है तो वह सपा के ंिहदू उम्मीदवारों के सामने मजबूत मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर उनका खेल खराब करेगी। जिसका सीधा फायदा भाजपा को होगा। यही वह उलझन है जिससे अखिलेश यादव को बाहर आना है। अभी वह पूरी तरह से पसोपेश में हैं। यहां यह कहना भी सही होगा कि बसपा का विपक्षी गठबंधन में आना भाजपा के लिए गंभीर चुनौती पेश करेगा।
सपा के लिए पश्चिम में राहत की बात यह है कि उनके साथ जाट नेता जयंत चौधरी है। इसका फायदा उन्हें कैराना लोकसभा सीट पर मिल सकता है। पिछले विधान सभा चुनावों में कैराना, शामली और थानाभवन सीट सपा और लोकदल ने जीती थी और गंगौह एवं नकुड़ सीट पर भाजपा मुश्किल से जीती थी। इसलिए आगामी लोकसभा चुनावों में यह तो तय है कि विपक्ष और भाजपा में सहारनपुर की दोनों सीटों पर कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा। कैराना लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व भाजपा के प्रदीप चौधरी करते हैं। जिन्हें पिछले चुनावों में 566961 वोट मिले थे। जबकि सपा-बसपा गठबंधन की उम्मीदवार तब्बसुम हसन 474801 वोट ही ले पाई थीं।
इस सीट पर भाजपा उम्मीदवार को पड़े वोट तब्बसुम हसन और हंिरदर मलिक को मिले वोटों से भी ज्यादा थे। लेकिन मौजूदा हालात में स्थिति भाजपा के लिए आसान नहीं है। वजह जाटों का रूझान बदला हुआ है।
भाजपा सहारनपुर में राघव लखनपाल शर्मा पर और कैराना में प्रदीप चौधरी पर ही दांव लगा सकती है। राघव लखनपाल शर्मा को पंजाबी होने का लाभ मिल सकता है। यूपी में सहारनपुर ही एक ऐसी अकेली सीट है जहां से पंजाबी को टिकट दिया जा सकता है। लेकिन भाजपा के लिए सीट जीतना पहला मकसद होगा। इसलिए वह सैनी या राजपूत दमदार उम्मीदवार भी उतार सकती है। उसके पास राज्यमंत्री जसवंत सैनी और पूर्व मंत्री ठाकुर सुरेश राणा उपयुक्त नाम हैं।